स्वतंत्रता के अमर सेनानी महाराणा प्रताप और हल्दी घाटी युद्घ

maharana pratap31 मई को प्रताप जयन्ती
प्रात: स्मरणीय महाराणा प्रताप (1540-1597 ई.) देश के उन महान सपूतों में से है जिन्होंने मातृभूमि की रक्षा और मान-सम्मान के लिए सर्वस्व न्योछावर कर दिया। जीवन पर्यन्त वह आक्रमणकारियों से संघर्ष करते रहे किन्तु झुके नहीं और उनकी अधीनता स्वीकार की। महाराणा प्रताप की जीवनी के लेखक राजेन्द्र शंकर भट्ट के शब्दों में ”महाराणा प्रताप ”प्रताप” थे और अकबर ”अकबर”। एक ओर विश्व का उस समय  का सबसे शक्तिशाली सम्राट अकबर भारत के सभी भागों विशेषत: तत्कालीन राजपूताना के राज्यों पर आधिपत्य स्थापित करना चाहता था। छल बल से उसे अपने प्रयत्नों में सफलता भी प्राप्त हुई किन्तु मेवाड़ के महाराणा ने अपना सिर नहीं झुकाया। वह निरन्तर आक्रमणकारियों से मुकाबला करते रहे। कविवर केसरी सिंह बारहठ के शब्दों में-

”पग पग भग्या पहाड़, धरा छांड राख्यों धरम।
महाराणा रॅ मेवाड़, हिरदे बसिया हिंद रे।।”

अर्थात् धर्म की रक्षा के लिए वह अपना राज्य छोड़कर पहाड़ों में भटकते रहे। इसलिए महाराणा और मेवाड़ हिंदवासियों के हृदय में बसे हुए हैं।
उस समय की विषम परिस्थितियों पर दृष्टि डाले तो सन् 1568 ई0 में मेवाड़ की राजधानी चितौड़ महाराणा प्रताप के पिता महाराणा उदयसिंह के हाथों से निकल चुकी थी। सन् 1572 ई0 में पिता के देहावसान के पश्चात् महाराणा प्रताप मेवाड़ की गद्दी पर विराजमान हुए तथा गोगुन्दा में उनका राजतिलक हुआ। 32 वर्षीय युवा महाराणा प्रताप ने अपनी सेना को संगठित किया। इसमें आदिवासी भीलों को भी प्रमुख स्थान दिया गया। बादशाह अकबर ने जलाल सिंह, आमेर के कुंवर मानसिंह, राजा भगवान दास और टोडरमल को समझाने के लिए भेजा तथा मेवाड़ और मुगलों में संधि के प्रयास भी किये गये किन्तु महाराणा अधीनता स्वीकार करने को तैयार नहीं थे।
महाराणा प्रताप ने प्रण किया ”जब तक चितौड़ स्वतंत्र नहीं करा लूंगा तब तक सोने चांदी के बर्तन में भोजन नहीं करूंगा। महलों में वास नहीं करूंगा, न कोई उत्सव मनाऊंगा न रण में अपने गौरव की घोषणा करूंगा और अपनी  मूंछों पर ताव भी नहीं दूंगा।”

अन्तत: सन् 1576 ई. में हल्दीघाटी का युद्घ हुआ। आमेर के कुंवर मानसिंह और आसिफ खां के नेतृत्व में 5000 सैनिकों की फौज के साथ अप्रेल माह में शाही फौज ने अजमेर के लिए प्रस्थान किया। मानसिंह के नेतृत्व में भाले, तलवारों, तेजी से वार करने वाले धनुष बाण एवं तीरों तथा छोटा तोपखाना और जंगी हाथियों से सुसज्जित मुगल सेना ने अजमेर होते हुए मेवाड़ की ओर प्रस्थान किया। मेवाड़ में बनास नदी के उत्तरी किनारे पर खमनोर गा्रम से दो मील की दूरी पर मोलेला गांव के निकट पड़ाव डाला।

महाराणा  की सेना में भी 3000 घुड़सवार 2000 पैदल, 100 हाथियों और 100 नगाड़े व तुरही वाले आदमियों के साथ खमनोर के दक्षिण पश्चिम में करीब 12 मील की दूरी पर स्थित गांव लोसिंग में अपना पड़ाव डाल दिया। मेवाडिय़ों के पास तोपखाना व बंदूकें नहीं थीं। दोनों सेनाओं के शिविरों की दूरी लगभग 10 मील थी और बीच में थी हल्दी घाटी। महाराणा ने युद्घ से पूर्व अपनी राजधानी गोगूंदा से बदलकर कुम्भलगढ़ बना ली क्योंकि यह स्थान मुगल सेना के रास्ते से दूर था।

maharana pratap fight for our nation with akbar rajasthan21 जून,1576 को घमासान युद्घ हुआ जिससे रक्त का तालाब भर गया । इसी कारण यह स्थान रक्त तलाई कहलाता है। अब सेना की मध्य पंक्तियों के बीच घमासान युद्घ शुरू हुआ। मानसिंह हाथी पर सवार थे। चेतक पर सवार प्रताप ने भाले से मानसिंह पर वार किया। मानसिंह नीचे झुककर बच गए, किंतु उनके हाथी का महावत मारा गया। इस तेज आक्रमण में जब चेतक ने अपने पैर हाथी की सूंड पर जमाए ,तो वहां लगी तलवार से घोड़े की एक टांग जख्मी हो गई। प्रताप के इस साहसी आक्रमण से मुगल सेना अधिक सचेत हो गई और निरंतर तीर और भालों से आक्रमण कर प्रताप को शेष सेना से अलग करने के प्रयत्न में लग गई। प्रताप अत्यंत रणकौशल से अपने को बचाते हुए अपनी सेना की ओर आ गए। ऐसे संकट के समय प्रताप के मुख्य सरदार झाला मानसिंह ने प्रताप के शाही प्रतीकों को स्वंय ने धारण कर लिया। मुगल सेना झाला मानसिंह को राणा समझ कर टूट पड़ी। मेवाड़ की सेना बड़ी बहादुरी से लड़ती रही। इसके परिणाम-स्वरूप मुगल सेना के पांव उखडऩे लगे। ऐसी स्थिति में मुगलों की रिजर्व सेना के सेनापति मेहतर खान ने दुंदुभी बजवाकर घोषणा कर दी कि बादशाह अकबर स्वंय युद्घ क्षेत्र की ओर आ रहे हैं। इससे मुगल सैनिकों में जोश आ गया और वह अधिक जोश से लडऩे लगे, किंतु बहादुर मेवाड़ी सेना के सामने कामयाब नहीं हो सके।

मध्यान्ह तक अनिर्णय की स्थिति में युद्घ समाप्त हो गया । मुगल सेना और 300 घायल हो गए। मुगल सैनिक इतने थक गए थे कि अब मेवाड़ की सेना का पीछा करने की उनमें शक्ति नहीं थी। खाने के लिए भी केवल आम व मांस ही उपलब्ध था।

इतिहासकारों का मत है कि जब अप्रेल में ही मानसिंह के नेतृत्व में सेना को भेज दिया गया था, तब जून तक किस कारण से इंतजार करते रहे ? जून की तपती गर्मी का मौसम युद्घ के लिए किसी तरह भी उपयुक्त नहीं समझा जा सकता । इतिहासकार अल बदायंूनी, जो हल्दी घाटी के युद्घ के समय स्वयं उपस्थित था, वह लिखता हैं- ’21 जून की तपती दोपहरी में सिर भन्ना रहा था तथा हवा भट्टी की तरह दहक रही थी, इससे सैनिकों में फुर्ती बिल्कुल नहीं रही”। युद्घ में शाही सेना मेवाड़ विजय तो नहीं कर सकी, किंतु इसका परिणाम यह रहा कि अकबर अपने सेनापतियों से बड़ा खफा हो गया। कुछ समय के लिए मानसिंह और आसफ खां दोनों का शाही दरबार में जाना बंद कर दिया गया। आढ़ा दुरसा ने महाराणा प्रताप को श्रद्वांजलि अर्पित करते हुए लिखा है।

अकबर जासी आप,दिल्ली पासी दूसरा।
पुनरासी परताप,सुजस न जासी सूरमा ।।

अर्थात सम्राट अकबर का संसार छोड़कर जाना तो निश्चित है और दिल्ली पर अन्य लोगों का कब्जा होगा, किंतु हे पुण्यवान वीरवर प्रताप, तेरा सुजस तो सदा अमर रहेगा ।
प्रात: स्मरणीय महाराणा प्रताप स्वतंत्रता संग्राम में भी देश भक्तों के प्रेरणा स्त्रोत रहे है। सुप्रसिद्व पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी ने समाचार पत्र ” प्रताप” के माध्यम से जनमानस को स्वतंत्रता आंदोलन के लिए प्रेरित किया । विद्यार्थी के शब्दों में ”जब तक इस दुनिया में उदारता, स्वतंत्रता और तपस्या का आदर है, तब तक हम भारतवासी ही नहीं सारा संसार प्रताप को आदर की दृष्टि से देखेगा” । सन् 1597  में 57 वर्ष की आयु में महाराणा प्रताप का शरीर पंच तत्व में विलीन हो गया।

देवी सिंह नरूका

और अन्य समाचार

Be the first to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Connect with Facebook

*