पर्यटन के साथ सांस्कृतिक धरोहरों का संरक्षण

rajasthan tourisam

राजस्थान पर्यटन की दृष्टि से सदैव सिरमौर रहा है। विश्व पर्यटन मानचित्र पर राजस्थान विशेष महत्त्व रखता है। प्रदेश की अर्थ व्यवस्था को सुदृढ़ आधार प्रदान करने में पर्यटन का महत्त्व सुविदित है। राजस्थान जैसे प्रदेश की ही यह विशेषता है कि यहाँ बारहों मास कहीं ना कहीं कोई मेला ,पर्व या त्यौहार मनाया जाता है। उत्सवों का माहौल इस राज्य को अन्यों से विशिष्ठ बनाता है। यहाँ की बहुरंगी संस्कृति देशी-विदेशी सैलानियों को लुभाती है। पर्यटन के माध्यम से हम एक ओर ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का संदेश देते हैं वहीँ दूसरी ओर यह हमारे लाखों परिवारों की आजीविका का जरिया बना हुआ है।
मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने पर्यटन के महत्त्व को स्वीकारते हुए वर्ष 2014-15 के बजट में इसके समुचित विकास के साथ सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण का संकल्प दोहराया है जो अपने आप में एक शुभ संकेत है। इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि प्रदेश में देशी-विदेशी सैलानियों के लिए सब कुछ मौजूद है। हमारे यहाँ केवल पानी का समंदर नहीं है लेकिन ऐसा समंदर मौजूद है जो विरले ही कहीं मिलता है जिसे सुनहरी रेत का समंदर कहते हैं। विदेशी सैलानी इस समंदर की सैर करने के लिए सात समंदर पार से राजस्थान आते हैं।.यहाँ के ऐतिहासिक दुर्ग, कलात्मक हवेलियाँ,बावड़ियाँ ,विश्व प्रसिद्ध धार्मिक स्थल और वन्य जीव अभयारण्य प्रदेश के पर्यटन महत्त्व को और बढ़ा देते हैं।
प्रदेश की बहुरंगी लोक संस्कृति के रूप में यहाँ लोक कला,लोक संगीत,लोक साहित्य, लोक गीत, लोक नृत्य, लोक वाद्य और अनूठा हस्तशिल्प देशी-विदेशी सैलानियों को बहुत आकर्षित करता है। मुख्यमंत्री ने पर्यटन विकास के लिए ‘राजस्थान दिवस’ को एक फेस्टिवल के रूप में मनाने का निश्चय किया है। यह स्वागत योग्य कदम है।
यहाँ यह कहना प्रासंगिक होगा कि राजस्थान के कलाकारों को इस दिवस पर उचित प्रतिनिधित्व और सम्मान मिलना चाहिए । राजस्थान में हर क्षेत्र में ऐसी हस्तियाँ मौजूद हैं जिनकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खास पहचान है। पिछली प्रदेश सरकार ने राजस्थान दिवस पर राज्य के पुरोधाओं को ‘राजस्थान रत्न’ सम्मान से नवाजने का अनुकरणीय सिलसिला शुरू किया था,उसे जारी रखा जाना चाहिए। कला,साहित्य,संस्कृति, विज्ञान,समाज सेवा के लोगों का सम्मान एक प्रकार से समाज सम्मानित होता है।
राज्य में आज भी ऐसे अनेक महत्वपूर्ण धार्मिक एवम पुरा महत्त्व के स्थल यत्र तत्र मौजूद हैं जिनका संरक्षण होना चाहिए। इसकी जिम्मेदारी नवगठित सांस्कृतिक धरोहर संरक्षण एवं प्रौन्नति प्राधिकरण निभा सकता है। सांस्कृतिक धरोहरों को नष्ट करने वाले तत्वों से निपटने के लिए प्राधिकरण को शक्ति संपन्न बनाने की आवश्यकता है। प्रदेश में धार्मिक पर्यटन को व्यापक बनाने की भारी गुंजाईश का लाभ उठाया जाना चाहिए। इन क्षेत्रों को सुविधाजनक बनाया जाना चाहिए ताकि अधिकाधिक श्रृद्धालु यहाँ पहुंचें। धार्मिक स्थलों तक श्रृद्धालुओं की पहुँच को सुगम और निर्बाध बनाना होगा। श्रृद्धा स्थल संकरे और तंग एवं भीडभाड वाली गलियों में होने के कारण लोगों की पहुँच से बाहर होते जा रहे हैं । वहां अतिक्रमण हटने चाहिए और जरूरत हो तो बाधक बने बीच के भवनों को ध्वस्त कर सडकों को चौड़ा किया जाना चाहिए।
बजट में पर्यटक एवं धार्मिक स्थलों को हवाई सेवा से जोड़ने की बात भी कही गयी है। इस से जहाँ श्रृद्धालुओं को आसानी होगी वहीं पर्यटन उद्योग एवं व्यवसाय को भी इसका लाभ पहुंचेगा । राजधानी जयपुर से सभी संभाग और महत्वपूर्ण जिलों तक हवाई सेवा आज अवश्यम्भावी हो गई है। इन्टरनेट की तरह ही त्वरित ,शीघ्रगामी एवं सुविधाजनक यातायात सुविधा समय की मांग है। इसे क्रियान्वित करना राज्य सरकार का बड़ा कदम होगा.राज्य सरकार अपने दो राजकीय वायुयानों को हवाई टेक्सी के रूप में उपयोग में लाने को तैयार है, साथ ही छोटे विमानों के लिये कंपनियों से समझोते करेगी ,जो सराहनीय कदम है।
राज्य सरकार द्वारा चूरू में नेचर पार्क की घोषणा की गयी है। तालछापर में काले हरिणों का पार्क पहले से ही जग प्रसिद्ध है। काले हरिणों के लिए जोधपुर के धवा- डोली अभयारण्य का अपना महत्त्व है। ऐसे वन क्षेत्रों को भी विकसित किया जाना चाहिए। बीकानेर,जोधपुर,जैसलमेर,पाली, माउन्ट आबू के साथ अब साम्भर क्षेत्र को जोड़कर मेगा डेजेर्ट टूरिस्ट सर्किट बनाने की घोषणा उत्साह वर्धक है लेकिन इतनी बड़ी योजना के लिए पचास करोड़ की रकम नाकाफी है। इस योजना को वृहद् बनाने के लिए केंद्र सरकार का सहयोग लिया जाना चाहिए।
फारूक आफरीदी

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