चुनाव लड़ना आसान नहीं

Neta-Ji-Cartoon rajasthan election 2013

सन1947 को महात्मा गांधी के नेतृत्व में अहिंसामय आन्दोलन की धुरी पर भारत अंग्रेजों की दासता से मुक्त होकर आजाद हुआ। हमारे देश के स्वतंत्रता सेनानियों ने आजाद भारत में शासन की बागडोर आम नागरिक के हाथों में उन्हे मताधिकार का अधिकार देकर सौंपी। मताधिकार को प्राप्त करने के लिए देश में चुनाव प्रक्रिया को अपनाया जो हमारे प्रजातंत्र (लोकतंत्र) की नींव बनी। चुनाव के आधार पर आम व्यसक नागरिक को अपने मत के अनुसार अपनी पसन्द के राजनैतिक दल की नीतियों, असूलों, सिद्धान्तों के आधार पर योग्य, ईमानदार, निश्ठावान, सेवाभावी, राष्ट्रभक्त आदि गुणों वाले व्यक्ति को चुनने का अवसर मिला। जिस राजनैतिक दल को आम नागरिक (मतदाता) द्वारा बहुमत से विजय बनाती वही राजनैतिक दल केन्द्र में लोकसभा और राज्यों में विधानसभा के रूप में शासन की बागडोर सम्भालता है। यह चुनाव प्रणाली निष्पक्ष, निडर, निर्भीक रूप से सम्पन्न हो इसके लिये चुनाव आयुक्त एवं सरकारी ईकाई की निगरानी में चुनाव सम्पन्न करवाये जाने की व्यवस्था हुई।
भारत के सन 1947 में स्वतंत्र होने के पश्चात देश में सन1950 में लोकतंत्र की स्थापना के साथ पहला आम चुनाव 1952 को लोकसभा एवं देश के विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं के लिये आरम्भ हुआ। जिसमें विभिन्न विचारधाराओं वाले कई राजनैतिक दलों ने इसमें भाग लेकर अपने अपने उम्मीदवार लोकसभा एवं विधानसभा में उतारे। उस समय के चुनाव में सभी राजनैतिक दलों के सामने देश हित में मूल्य आधारित राजनीति करने का लक्ष्य रहा। सभी दल राष्ट्रहित में चुनाव की प्रक्रिया में भाग लेकर निश्पक्ष चुनाव करवाने के पक्ष में रहते थे। चुनावों में जीत हासिल करने के लिये असामाजिक गतिविधियों से सभी राजनैतिक दल दूर रहते हुए चुनाव लड़ते थे। जिसमें धन का अधिक प्रदर्शन नहीं होता था, फिजुल खर्ची नहीं के बराबर होती थी, मतदाता को लुभाने के लिये अर्थ का सहारा नहीं लिया जाता था। चुनावी आचार संहिता का पालन करने के लिये सभी राजनैतिक दल सर्तक एवं सावधान रहते थे। लेकिन बहुमत प्राप्त कर सता पर हावी होने वाले राजनैतिक दल के नेताओं ने अपने स्वार्थ के लिये सता का दुरूपयोग करना शुुरू कर दिया। धन बटोरना आरम्भ कर दिया। मालामाल होने का उन पर भूत सवार हो गया। अपार सम्पति अर्जित करने की लालचा बढने लगी। सता के मद में अपने अधिकारों का दुरूपयोग करना शुरू कर दिया। सरकारी खजाने की रखवाली करने की अपेक्षा उसे अपनों में लुटाना शुरू कर दिया। सत्ता पर बने रहने के लिये ओछे एवं असामाजिक हथकंडे अपनाने आरम्भ कर दिये। कुर्सी पर बैठते ही अपने राजनैतिक दल की नीतियों व सिद्धान्तों को भूल गये। राष्ट्रहित की बात को गौण कर दिया। अपने कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करनी शुरू कर दी। वहां पद के मद के कारण ऐशोआराम की शाही जिन्दगी जीने लगे। जिसे देख करीब करीब सभी राजनैतिक दलों के अन्य नेता जो सत्ता से दूर थे, उन नेताओं के मुंह से सत्ता हथियाने के लिये लार टपकने लगी और उसके लिये हर कीमत पर चुनाव जीतने की सभी राजनैतिक दलों के नेताओं में आपसी होड़ लगनी शुरू हो गई।
चुनाव में येन केन प्रकार से जीतने के लिये आजादी के बाद के तीन चार आम चुनावों तक चुनाव लड़ने वाले राजनैतिक दल के नेता अपनी पार्टी के सिद्धान्तों एवं नीतियों का सहारा लेकर चुनाव में विजयी होने का अवसर प्राप्त करते रहे। उस समय असामजिक गतिविधियों को चुनाव में जगह नहीं थी। लेकिन प्राचीन राजघरानों का दबा दबा रहते हुए भी चुनाव अधिक खर्चीले एवं भय रहित होते थे। लेकिन उसके बाद तो सता की लालचा में दिनों दिन आम चुनाव चाहे लोकसभा के हो या विधानसभा के सब में अनैतिकता का बोलबाला शुरू हो गया। चुनाव में पैसा सबसे अहम बनते हुए चुनावों को सभी व्यवस्थाओं को सभी क्षेत्रों में झक्झोर के रख दिया। धन के लालच में नेताओं ने अपना ईमान, पारदर्षिता, निष्पक्षता, सत्यता, पार्टी के प्रति वफादारी, देष के प्रति भक्ति भावना, समर्थकों के प्रति कत्र्तव्य आदि को भुला कर सत्ता पर बैठने के लिये सभी प्रकार के अराजकता, अनीति, असामाजिकता, अत्याचार, अनाचार, भ्रष्टाचार आदि अमानवीय कृत्त्यों का सहारा लेकर सता तक पहुँचने में लगे रहें। जिसके कारण साधारण एवं मध्यम वर्ग के योग्य व्यक्ति का चुनाव लड़ने की औकार ही नहीं रहीं। सत्य, ईमानदार और साफ छबिवाले के पास प्रचुर मात्रा में धन का अभाव, दबंगों का साथ नहीं है तो ऐसे लोगों का चुनाव जीतना टेडी खीर बन गई।
वर्तमान समय में भारत के लोकतंत्र की सभी ईकाईयों पर शासन करने के लिये पहुंचने है तो चुनाव लड़ने के लिये पैसा पानी की तरह बहाने के लिये भ्रश्टाचार के माध्यम से तिजोरी भरी होनी आवष्यक है। जिसके आधार पर कार्यकर्ताओं के साथ मतदाताओं व विपक्ष के समर्थकों को खरीद करने की क्षमता होनी चाहिए। चुनाव में विजयी होने के लिये अधिक तादाद में वाहनों आदि साधनों की भरमार होनी चाहिये। मतदाताओं को डरा धमका कर अपने पक्ष में वोट हासिल करने के लिए असामाजिक तत्वों, दबंगों का जत्था होना चाहिये। जीत के अभाव की आशंका पर अपने साथ बूथ (चुनाव केन्द्र) को लूटने वालों की फौज होनी चाहिये। अपनी हार को जीत में बदलने के लिए फर्जी मतदाताओं की टोली होनी चाहिये। चुनाव जीतने के लिए अपराध करने एवं करवाने की हिम्मत होनी चाहिये। मतदाताओं को रिझाने के लिए, मनाने के लिए उन्हे खरीदने, लालच देने, षराब पिलाने, सामग्री लूटाने-देने, मादकद्रव्यों को बांटने की क्षमता होनी चाहिये। विजयी होने के लिए राजनैतिक छलकपट करने में माहिर होना जरूरी है, झूठ बोलने की क्षमता, धोखा देने की चाल, थोथे आश्वासन देने की मादा, चुनावी नियमों को तोड़ने की हिम्मत, प्रशासन को चकमा देने का दबदबा रखने में प्रवीण होना जरूरी है। इसके अतिरिक्त अपने स्वयं के काले कारनामों, अपराधिक कृत्यों, भ्रष्टाचार को छिपाने के साथ साथ अपनी आलोचनाओं को पचाने की शक्ति होनी चाहिये। यदि चुनाव जीतने के लिए आपके पास उक्त तथ्यों-साधनों का अभाव है तो चुनाव में विजय प्राप्त करना दूर की कोड़ी होगी अपितु चुनाव में खड़ा होने की हिम्मत ही आपको पस्त कर देगी।
देश में आजकल चुनाव खर्चीला, अपव्यय, अपराधिक गतिविधियों, दबंगों की अमानवीय हरकतों, फर्जीवाड़ा, छलकपट, धोखाधड़ी, झूठ और फरेब आदि के साथ साथ भ्रष्टाचार की देहलीज पर चढ़ कर अत्यधिक मंहगा होने के साथ साथ अपराधियों के हत्थे चढ जाने के कारण साधारण, सीधे साधे, नीतिवान, निश्ठावान, ईमानदार, सिद्धान्तवादी, पार्टी के वफादार, देश के हितैशी, जनता के सच्चे सेवक आदि गुणवालों के लिए चुनाव लड़ना बस की बात नहीं रही है। यद्यपि ऐसे गुणवान, नीतिवान लोग अब भी जनप्रिय, लोकप्रिय होने पर अपनी साफ छवि से चुनाव लड़ते है तो भारत के समझदार, निश्पक्ष मतदाता उनका मान सम्मान एवं उनकी देषभक्ति को ध्यान में रखते हुए केवल अपना मत ही नहीं देते है अपितु, उनके पक्ष में मतदान करवाने के लिये अपना भरपुर सहयोग करने में पीछे नहीं रहते है। जिसके कारण कुछ अंशों तक भारत के सच्चे लोकतंत्र की पहचान करवाता रहा है। यदि भारत के आदर्श लोकतंत्र को जिन्दा रखना है तो उसे असामाजिक गतिविधियों, दबंगों व अपराधिक प्रवृत्ति वालों और भ्रश्टाचारों के साथ धनबल व बाहुबल के चुंगल से बचना होगा तभी देश का साधारण नागरिक चुनाव लड़ने की हिम्मत जुटा पायेगा अन्यथा उनका चुनाव लड़ना आसान नहीं होगा।
 भूरचन्द जैन, स्वतंत्र पत्रकार, बाड़मेर

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